सामाजिक विकास
समाज के लिए जैवप्रौद्योगिकी आधारित कार्यक्रम में तीन घटक हैं जो विशिष्ट रूप से महिलाओं, अ.जा./अ.ज.जा. जनसंख्या तथा ग्रामीण समुदाय पर लक्ष्यित हैं। अब तक 53,000 से अधिक परिवार लाभान्वित हो चुके हैं। लक्ष्यांक जनसंख्या पर कार्यक्रम का दूरगामी प्रभाव रहा क्योंकि जैवप्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग द्वारा प्राथमिक रूप से यह समुदाय के आर्थिक सशक्तीकरण की ओर प्रयत्नशील है। वे बड़े क्षेत्र, जिनके माध्यम से डीबीटी लाभार्थियों को सहायता करता है वे जैव कीटनाशक, जैव उर्वरक अनुप्रयोग, जैविक खेती, मशरूमों की खेती, चिकित्सीय एवं सुगंधित पौधे, रेशम उत्पादन, प्रसंस्कृत खाद्य, पुष्प कृषि आदि के क्षेत्र हैं। इसके अतिरिक्त कार्यक्रम द्वारा स्वास्थ्य सलाह सेवाएं भी विशेष रूप से उन लोगों को जो आनुवंशिक क्रम भंगता से पीड़ित हैं, प्रदान की गई हैं, लगभग 19,000 लोगों ने परामर्श के माध्यम से लाभ उठाया है। लातूर, उत्तरकाशी तथा भुज में भूकंप पीड़ितों की रहत के लिए भी विभाग ने विशेष कार्यक्रमों को हाथ में लिया है। इन कार्यक्रमों को व्यापक स्तर पर सराहा गया है।
महिलाओं के लिए जैवप्रौद्योगिकी
ग्रामीण क्षेत्रों के लिए कार्यक्रम
एससी/एसटी जनसंख्या
महिलाओं के लिए जैवप्रौद्योगिकी
1. गतिविधियों का मुख्य जोर
- उद्यमिता विकास हेतु जैव प्रौद्योगिकीय प्रक्रमों एवं टूलों को विकसित, प्रोत्साहित एवं उपयोग करना एवं महिलाओं को रोजगार अवसर प्रदान करना
- शहरी महिलाओं के साथ‑साथ ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण हेतु एकीकृत सुविधाओं की स्थापना करना। गोल्डन जुबिली बायोटेक्नोलॉजी वोमेंस पार्क नाम से ऐसी एक सुविधा स्थापित की गई है जो कि अनुसंधान संस्थानों एवं औद्योगिक यूनिटों के बीच संबंध स्थापित करने के प्रयास करती है। पार्क वाणिज्यिक उपयोग के लिए आधारभूत प्रौद्योगिकियों को भी बढ़ाएगा तथा कुशल एवं सुप्रशिक्षित महिलाओं का एक समूह विकसित करने हेतु संबंधित क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदान करेगा। पार्क, महिला उद्यमियों एवं कारपोरेट क्षेत्र के मध्य संयुक्त विपणन रणनीतियों के लिए सहयोग विकसित करेगा।
- विशेष रूप से महिलाओं की समस्याओं के समाधान वाले अथवा उनसे संबंधित प्रौद्योगिकी पैकेजों को विकसित करने वाले अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं को सहायता प्रदान करना।
2. उपलब्धियाँ
इस अवधि के दौरान 21 राज्यों तथा संघ शासित क्षेत्रों में 48 परियोजनाओं को सहायता प्रदान की गई। इन परियोजनाओं ने खाद्य प्रसंस्करण, रेशम उत्पादन, मशरूम खेती, आर्किड एवं अन्य सजावटी पौधों का सूक्ष्म प्रवर्धन, जैव उर्वरक उत्पादन, बकरी एवं मुर्गी पालन, मत्स्य कृषि, गुणवत्ता ऊन उत्पादन हेतु शशक पालन, चिकित्सीय एवं सुगंधित पौधों की नर्सरियों की स्थापना के साथ‑साथ कुछेक जड़ी‑बूटी उत्पादों के सूत्रण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण के माध्यम से 18,000 से अधिक महिलाओं को लाभान्वित किया है। आनुवंशिक क्रमभंगता एवं परामर्श पर जागरूकता के माध्यम से अनेकों परिवार अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हुए। पुष्पकृषि, वर्मीकम्पोस्टिग , फल प्रसंस्करण, खाद्य प्रौद्योगिकी, मुर्गीपालन पर उद्यमिता के लिए प्रशिक्षित की गई महिलाओं ने अपनी निजी यूनिटें स्थापित की हैं और अपने उत्पादों की बिक्री द्वारा रूपये 3,000/‑ प्रतिमाह अर्जित कर रही हैं।
आनुवंशिक क्रम भंगता की जानकारी एवं परामर्श
यह परियोजना क्षेत्र में व्याप्त जन्मजात विकृतियों के आनुवंशिक क्रमभंगिताओं के प्रति बिम्ब जानने एवं शिशु नखरता के कारण वाची घटकों के बारे में महितलाओं को शिक्षित करने की दिशा में प्रयत्नशील है। इसके अतिरिक्त लखनऊ के आस‑पास छह गांवों के परिवारों को विशेषज्ञ व्याख्यानों, पोस्टरों, गांव स्तर पर स्वास्थ्य कार्मियों के प्रशिक्षण, डाक्टरों के दौरों एवं विभिन्न महिला समूहों के साथ बैठक के माध्यम से विभिन्न आनुवंशिक क्रमभंगताओं पर शिक्षित किया गया। लगभग 6,000 परिवारों से रक्त के नमूने संग्रहीत किए गए तथा विभिन्न आनुवंशिक क्रमभंगताओं विशेषकर थैलेसिमिया के लिए परीक्षित किए गए तथा युगलों को परामर्श दिया जा रहा है।
महिलाओं के लिए गोल्डन जुबली जैवप्रौद्योगिकी पार्क
इस पार्क को भारत सरकार की स्वाधीनता के स्वर्ण जयंती समारोह के भाग के रूप में स्थापित किया गया है। यह पार्क, तमिलनाडु राज्य सरकार के साथ एक संयुक्त परियोजना है जो पर्यावरण अनुकूल जैव प्रौद्योगिकीय उद्यमों के माध्यम से व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित महिलाओं को लाभकारी स्वरोजगार के कैरियर को अपनाने हेतु अवसर प्रदान करने की दिशा में प्रयास करता है। यह सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत है तथा इसमें स्वयं के उप नियम हैं तथा समस्त गतिविधियां एक शासकीय निकाय द्वारा नियंत्रित की जाती हैं। यह पार्क सीरूसेरी में स्थित है और बीस एकड़ से ऊपर भूमि पर फैला है। इसके पास प्रौद्योगिकी संसाधन, प्रशिक्षण, परीक्षण एवं विपणन की केन्द्रीभूत सुविधाओं के अतिरिक्त 20 औद्योगिक माडयूल तथा कृषि‑जैव‑प्रौद्योगिकी गतिविधियों के लिए 40 भू‑माडयूल्स हैं। कुल 20 पूर्व निर्मित औद्योगिक माडयूलों में से 12 माडयूल महिला उद्यमियों को सजावटी मछली, जड़ी‑बूटी उत्पादों, समृद्ध लवणों एवं खाद्य उत्पादों से संबंधित अपनी उत्पादन गतिविधियों को शुरू करने के लिए लीज आधार पर आबंटित किए गए। उनमें से सात ने उत्पादन एवं जड़ी‑बूटी प्रसाधनों, जैव उर्वरकों एवं कीटनाशकों, जड़ी‑बूटियों एवं शाक पत्तियों से समृद्धित मसाला चूर्णकों एवं मौलिक तेलों का वाणिज्यीकरण आरंभ कर दिया है। पार्क ने एक जीवित जीन बैंक के रूप में एक हर्बल गार्डेन तैयार किया है। भावी उद्यमियों को पार्क में अपनायी जाने वाली व्यवहार्य परियोजनाओं की पहचान करने में मदद के लिए एक डाटाबेस संरचित किया गया है।
गत वर्षों से चल रही 16 परियोजनाओं को वर्ष 2002‑03 के दौरान सहायता प्रदान की जा रही है। इसके अतिरिक्त, मुर्गी पालन में एक नई परियोजना को प्रायोजित किया गया है।
3. दसवीं योजना के लिए नए अभिक्रमः
दसवीं योजना के दौरान प्राथमिकता दी जाएगीः‑
- महिलाओं के तकनीकी सशक्तीकरण एवं आर्थिक लाभ के लिए जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में परियोजनाओं को कार्यान्वित करने में
- विशेष रूप से महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी समस्याओं के समाधान हेतु अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं को सहायता प्रदान करने में,
- जैवप्रौद्योगिकी में उद्यमिता विकास के लिए परियोजनाओं को हस्तगत करने में।
ग्रामीण क्षेत्रों के लिए कार्यक्रम
ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी पैदा करने तथा बेहतर स्वास्थ्य देखभाल, जैवप्रौद्योगिकी पैकेजों के बारे में जागरूकता पैदा करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने के लिए जैवप्रौद्योगिकी प्रक्रम एवं टूलों के प्रयोग के प्रचार हेतु विभिन्न राज्यों में प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन परियोजनाओं को सहायता दी जा रही है। 25,000 से अधिक लोगों को विभिन्न क्षेत्रों जैसेः बंजरभूमि का उपयोग, कृमि संवर्धन एवं कृमि खाद, खाद्य प्रौद्योगिकी , रेशम कीट पालन, मशरूम की खेती, पुष्प कृषि, जैव उर्वरक, जल कृषि, मुर्गीपालन, गुणवत्ता ऊन उत्पादन हेतु शशक पालन, चिकित्सीय एवं सुगंधित पौधे तथा आयुर्वेदिक औषिधियों के सुत्रण में प्रशिक्षित किया गया है।
उत्तरांचल के रूद्रप्रयाग एवं चमोली जिलों तथा गुजरात के भुज क्षेत्र में भूकम्प पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कार्यक्रम हाथ में लिए गए। विभिन्न संगठनों को भूमक्प पीड़ितों को भिन्न भिन्न गतिविधियों जैसेः खाद्य प्रसंस्करण, जैविक खेती, औषधीय पौधों की खेती, जलकृषि आदि में प्रशिक्षित करने के लिए सहायता प्रदान की गई थी। प्रभावित परिवारों को लाभान्वित किया गया और वे अब अपने उत्पादों की बिक्री से अतिरिक्त आमदनी अर्जित कर रहे हैं। जैविक खेती, बागवानी एवं वानिकी के ऊतक संवर्धन पादपों की खेती, पशुचारा एवं स्वास्थ्य देखभाल, स्पाइरूलिना उत्पादन के अन्य क्षेत्रों में भी कई प्रभावित परिवोरों को लाभ पहुँचाने के लिए सहायता प्रदान की गई।
गुजरात स्थित मोचा में एक नमूना जैव ग्राम परियोजना स्थापित की गई थी। मोचा ग्राम में प्रतिदिन 30,000 लीटर पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए पीने के पानी का एक संयंत्र स्थापित किया गया। परियोजना ने किसानों को अपने क्षेत्र को स्व रोजगार के लिए उपयोग में लाने के लिए उनके बीच जागरूकता पैदा की। दर्शित सफलता के आधार पर गुजरात जल आपूर्ति एवं जल मल निपटान बोर्ड ने आरओ संयंत्र को दीर्घावधि आधार पर चलाने एवं अनुरक्षण करने के लिए हस्तगत किया है। कपास, मूंगफली तथा बाजरा हेतु जैवकीटनाशी एवं जैव उर्वरक के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए प्रदर्शन प्लाट भी स्थापित किए गए थे।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद, मध्य प्रदेश के माध्यम से राज्य के 5 जिलों के 10 ग्रामों में रेशम कीट पालन, कृषि संवर्धन, प्राकृतिक रेशों से मूल्य वर्धित उत्पाद विकास स्पाइरूनिला उत्पादन, पुष्पशिल्प सहित पुष्प कृषि, मत्स्य पालन तथा पश्च फसल प्रौद्योगिकी जैसी गतिविधियों को अपनाने के लिए एक और जैव ग्राम परियोजना को सहायता प्रदान की गई। शाहहाँपुर में सहायता प्राप्त जैवग्राम परियोजना का कार्य लाभार्थियों को गन्ने की खेती के लिए प्रशिक्षण देना है। पवित्र एवं पोषणीय ढंग से अपनाने के लिए ग्रामीण लोगों को व्यवधर्म एवं पारिस्थितिकीय रूप से अनुकूल प्रौद्योगिकियों के प्रदर्शन हेतु ग्रामीण जैवसंसाधन कॉम्पलेक्स (आरबीसी) की स्थापना हेतु एक संकल्पना विकसित की गई थी। पहले चरण में चार राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (मराठवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय, जीवी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बेंललूर तथा हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार को निधिकृत किया गया है।
अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति जन संख्या
गतिविधियों का मुख्य जोर
अनु.जाति/अ.ज.जा. के लोगों के सामाजिक आर्थिक स्तर को सुधारने के लिए अ.जा./अ.ज.जा. समुदाय के कौशल विकास एवं आमदनी का स्रोत पैदा करने के लिए प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण परियोजनाओं को सहायता प्रदान की गई थी। विभिन्न विश्वविद्यालय, सार्वजनिक निधिकृत संस्थान, कृषि विज्ञान केन्द्र, गैर सरकारी संगठन, स्वैच्छिक एवं गैर सरकारी संगठन परियोजना क्रियान्वयन के अंग थे। सुगंधीय एवं औषधीय पादपों की खेती, मशरूम एवं स्पइरूलिना खेती, पादप कीटों एवं रोगों का जैविक नियंत्रण, कृषि संवर्धन एवं कमि खाद, जैव उर्वरक, जलकृषि, पुष्प कृषि, मुर्गीपालन, मानव स्वास्थ्य देखभाल आदि पर विभिन्न परियोजनाओं को सहायता प्रदान की गई।
औषधीय पौधे
आंध्र प्रदेश में दो मण्डलों के 100 ग्रामों में क्रियान्वयन हेतु हर्बल फोकलोर रिसर्च सेंटर, तिरूपति में स्वास्थ्य देखभाल प्रक्रियाओं को मजबूत बनाने एवं औषधीय तथा पोषणीय पौधों के संरक्षण पर एक परियोजना शुरू की गई थी। दलितों एवं जनजातियों को शामिल करते हुए चित्तूर जिले के गांवों का सर्वेक्षण किया गया तथा प्रदर्शन बगीचे में स्थापना तथा खास एवं संकटापन्न पौधों हेतु जर्मप्लाज्म संरक्षण हेतु प्रलेखीकृत किया गया। औषधीय प्रजातियां जो समुदायों में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए बहुतायत में प्रयोग की जाती हैं, की पहचान की गई तथा एसएचजी को औषधीय पौधों के प्रयोग एवं इनकी खेती के लिए प्रशिक्षित किया गया।
जैव ईंधन
अनुसूचित जाति के लोगों के लिए आमदनी पैदा करने की एक गतिविधि के रूप में सामाजिक विज्ञान अनुसंधान केन्द्र, कोयंबतूर में जैव ईंधन एवं अन्य उत्पादों के उत्पादन हेतु तमिलनाडु के नमक्काल जिले की शुष्क भूमि में जट्रोफा की खेती के लिए एक परियोजना हाथ में ली गई थी। खेती, बीज संग्रहण, नर्सरी तकनीकें एवं तेल निष्कर्षण प्रक्रमों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए। एसएचजी निर्मित किए गए एवं पौध तैयार करने के लिए आवश्यक निवेश मुहैया कराया गया। कृमि खाद के गड्ढे भी खोदे गए एवं जट्रोफा रोपण के साथ साथ अंतर फसलें जैसे काला चना, हरा चना एवं लोबिया उगाने के लिए केचुओं की आपूर्ति की गई।
वैनिला ऊतक संवर्धन
पीयरमेड डेवलपमेंट सोसायटी, जिला इडुक्की, केरल द्वारा अ.जा./अ.ज.जा. के लोगों की आर्थिक दशा को सुधारने हेतु ऊतक संवर्धन वैनिला की खेती पर एक परियोजना क्रियान्वित की जा रही है। विभज्योत्तक (मेरीस्टेम) संवर्धन के द्वारा रोग मुक्त, शीघ्र पुष्पण वाली एवं उच्च पैदावार वाली वैनिला फसल के उत्पादन हेतु कार्य आरंभ किया जा चुका है। पादपकों की कटाई एवं दृढ़ीकरण के बाद इन्हें इडुक्की जिले के सात चयनित गांवों के अ.जा./अ.ज.जा. के लाभार्थियों में वितरण के लिए ग्रीन हाउस को अंतरित किया जा चुका है। आस पड़ोस में बहुतायत में उपलब्ध घास पात के प्रयोग द्वारा वैनिला की जैविक खेती के लिए सस्य विज्ञान कार्यव्यवहारों में प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।
जैव उर्वरक
तमिलनाडु के सलेम जिले के वीरा पंडी की अ.जातियों में उन्नत कृषि पैदावार हेतु जैव उर्वरक के एक प्रभावी स्रोत के रूप में कृमि खाद के विकास एवं कार्यव्यवहार पर एक परियोजना जीआरडी एजूकेशनल ट्रस्ट, कोयंबतूर में क्रियान्वित की गई थी। जागरूकता कार्यक्रम संचालित किए गए थे तथा 300 से अधिक लोगों को कृमि खाद तैयार करने की तकनीकों में प्रशिक्षित किया गया। उत्पादित उर्वरक को फसल उत्पादन में कृमि खाद के रोजगार एवं आमदनी पैदा करने की गतिविधि के रूप में उपयोग किया जाता है।
जैव कीटनाशी
मदुरै कामराज विश्विद्यालय, मदुरै में कीट नियंत्रण हेतु नीम तथा अन्य पौधों पर आधारित जैवकीटनाशकों के उत्पादन एवं अनुप्रयोग पर एक परियोजना क्रियान्वित की गई थी। कृषि कीटों के नियंत्रण हेतु किसानों को नीमा, एकोरस तथा जट्रोफा सूत्रणों को तैयार करने एवं अनुप्रयोगो हेतु प्रशिक्षित किया गया था। फसल कीटों तथा संग्रहण कीटों, दोनों के नियंत्रण हेतु पादप उत्पादनों की प्रभावोत्पादकता पर जागरूकता अभियान चलाए गए। ग्राम कर्मचारियों के लाभ हेतु प्रशिक्षणि आयोजित किया गया तथा लोगों को जैवकीटनाशकों के लिए उत्पादन सुविधा के प्रयोग पर प्रशिक्षित किया गया। परियोजना गतिविधि को बनाए रखने के लिए स्थापित कीटनाशी उत्पादन सुविधाओं को भी ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित कर दिया गया।
कृषि विज्ञान केन्द्र, प्रवर इंस्टीटयूट आफ रिसर्च एंड एजूकेशन इन नेचुरल एण्ड सोशल साइंसेज (पीआईआरइएनएस), बभलेश्वर, जिला अहमदनगर, महाराष्ट्र में कृषि पारिस्थितिकीय संरक्षण पर एक परियोजना क्रियान्वित की गई। कीटों एवं रोगों के नियंत्रण के लिए जैव अभिकर्मकों को उत्पादित किया गया तथा प्रदर्शन हेतु लाभार्थियों को आपूर्त्त किया गया । अ.जा./अ.ज.जा. के परिवारों को प्रशिक्षण लेने, प्रदर्शन करने तथा विभिन्न फसलों पर कीटों एवं रोगों के भिन्न भिन्न जैव नियंत्रण अभिकर्मकों (एचएएनपीवी, नौउमुरीय स्प., ट्राइकोडरमा स्प., पीसिलोमाइसेस स्प. तथा वर्टिसिलियम स्प.) के परीक्षणों के लिए चयनित किया गया था। लाभार्थियों ने औसतन रूपये 2,800 प्रति एकड़ के हिसाब से आमदनी अर्जित की।
जैविक खेती/ कृमि खाद
महाराष्ट्र के वासिम जिले की अ.जा./अ.ज.जा. की जनसंख्या के लाभ हेतु, कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके) कर्दा द्वारा कृमि खाद तैयार करने के प्रदर्शन पर एक परियोजना क्रियान्वित की गई थी। कई यूनिटें लाभार्थियों के फार्मों में स्थापित की गईं। जैविक खेती की संकल्पना के बारे में बेहतर समझ देने के लिए प्रदर्शन यूनिटों पर किसाननों को भी प्रशिक्षित किया गया तथा सोयाबीन, काला चना, हरा चना तथा मूंगफली पर किए गए परीक्षणों ने अच्छी पेदावार प्रदर्शित की। विपणन सहयोजकों के साथ कृमि खाद एक साथ मिलकर बिक्री की जा रही है। परियोजना ने किसानों को कृमि खाद तैयार करने के लाभ तथा जैविक फसल उत्पादन में इसके प्रयोग के बारे में विश्वस्त किया है।
रेशम कीट पालन
तमिलनाडु में सलेम जिले की जनजाति जनसंख्या हेतु शहतूत खेती तथा रेशम कीट पालन आमदनी एवं रोजगार सृजन के प्रभावी मौके हैं। किसानों विशेषकर छोटे किसानों एवं कृषि कामगारों के आर्थिक सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए रेशम संवर्धन में बहुत ऊजा है, इसलिए तमिलनाडु में सालेम जिले के यरकौड ब्लाक की जनजाति जनसंख्या के लिए रेशम संवर्धन प्रौद्योगिकी पर एक प्रदर्शन किया गया। चुनिंदा गांवों में क्षेत्रीय रेशम संवर्धन अनुसंधान स्टेशन की मदद से शहतूत की खेती एवं टपक सिंचाई, कोया उत्पादन, पालन गृह का निर्माण तथा चाकीपालन के पहलुओं पर लाभार्थियों को प्रशिक्षित किया गया।
जलकृषि
तमिलनाडु स्थित जलकृषि अनुसंधान एवं विस्तार केंद्र (सीएआरई), पलायमकोट्टाई में मुरेल (स्वच्छ जल मछली) संवर्धन एवं बीज उत्पादन पर एक परियोजना का कार्य हाथ में लिया गया था। मुरेल कम वसा, कम अंतरमांसपेशीय कांटों तथा अवक्षयित आक्सीजन में जीवित रहने के लिए जानी जाती है तथा स्वच्छ जल मछलियों में सबसे ऊँची कीमत (लगभग 200 रूपये प्रति किलो) भी देती है। अ.जा./अ.ज.जा. के युवकों को मुरेल प्रजातियों की पहचान, लैंगिक द्विरूपता, प्रेरित प्रजनन तकनीक, बीज उत्पादन तथा लार्वासंवर्धन आर्टेमिया एवं रोटिफरो के साथ जीवित चारा संवर्धन कैटफिश के साथ एकल संवर्धन एवं बहुसंवर्धन तथा रोग नियंत्रण पर प्रशिक्षित किया गया। लाभार्थियों को विभिन्न मत्स्य फार्मों तथा मत्स्य संवर्धन कार्यव्यवहार के लिए भी प्रशिक्षित किया गया। लाभार्थियों ने एकल संवर्धन एवं बहुसंवर्धन कार्यव्यवहारों को अपनाया और सात महीनों में लगभग 9,000/ रूपये अर्जित किए।
अ.जा./अ.ज.जा. जनसंख्या के लाभ हेतु कल्याणी विश्वविद्यालय में मत्स्य बत्तख कृषि पर एक परियोजना कार्यान्वित की गई। पशुपालन की रीसाइक्लिग एवं उपयोग के माध्यम से पूरक चारा एवं रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग को कम करके कम उत्पादन लागत के साथ एकीकृत मत्स्य सवंर्धन को प्रोत्साहित करने के लिए इसे हाथ में लिया गया। मछुआरा सहकारी समितियां सृजित की गईं तथा चंदामारी, भोमरा तथा हरिंगाटा गांवों के 400 परिवारों को बत्तख एवं मत्स्य संवर्धन एवं मुर्गी एवं मत्स्य संवर्धन के विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षित किया गया।
मछली उत्पादन को उन्नत बनाने तथा गरीबी उन्मूलन हेतु छत्तीसगढ़ के ग्राम्य तालाबों में मत्स्य, बत्तख एवं बागवानी कृषि के एकीकरण पर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय , रायपुर में एक परियोजना हाथ में ली गई। चुनिंदा जनजातीय परिवारों के लिए एकीकृत जलकृषि पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए तथा तालाब की तैयारी, प्रजातियों के चयन, मत्स्य बीजों के संग्रहण, पालन तथा तालाब के जालन पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। महाराष्ट्र के थाणे जिले के पालघर तालुका में माहिम एवं मासवान नामक दो गांवों में अविरल संसाधन हेतु एकीकृत जलकृषि कार्य को हाथ में लिया गया, एकीकृत मत्स्य कृषि, नर्सरी प्रबंध्न, मुर्गीपालन प्रबंधन, कार्य को विकास प्रौद्योगिकी, सजावटी मत्स्य संवर्धन , ब्रूडर स्वच्छ जल प्रान का पालन, स्पाइसलिना संवर्धन, मृदा एवं जल गुणवत्ता प्रबंधन, मशरूम संवर्धन तथा कृमि खाद तैयार करने की प्रौद्योगिकियों को लोगों में हस्तांतरित किया गया। प्रशिक्षण नियम पुस्तिकाएं तैयार की गईं तथा ग्रामवासियों को वितरित की गईं।
मशरूम कृषि
मदुरै एवं विरूद्धनगर जिलों के बेरोजगार अ.जा./अ.ज.जा. के लोगों के लिए मदुरै कामराज विश्वविद्यालय में मशरूम खेती पर एक परियोजना कार्यान्वित की गई। मिल्क मशयम तथा ओयस्टर मशरूम की खेती पर एक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। स्वास्थ्य एवं शस्य कर्त्तन पहलुओं सहित मशरूम खेती पर युवकों को प्रशिक्षित किया गया था प्रशिक्षार्थियों ने आय बढ़ाने की गतिविधि के रूप में मशरूम की खेती करना शुरू कर दिया है। कुछेक प्रशिक्षार्थियों ने अपनी निजी मशरूम उत्पादन यूनिटें स्थापित कर ली हें तथा नियमित आय अर्जित कर रहे हैं।
नई प्राथमिकताएं
इन गतिविधियों के कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है जिनका समाज स्वास्थ्य रक्षा प्रणाली, पर्यावरण एवं स्वच्छता तथा उद्यम विकास से सीधा संबंध है ताकि प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन द्वारा अधिक से अधिक लाभों को विस्तृत किया जा सके।
खेती बारी/बागवानी से जुड़े हुए ग्रामीण एवं अ.जा./अ.ज.जा. परिवारों की आर्थिक स्थिति को सुधारने में सहायता करने के लिए जैविक खेती के पहलुओं को और अधिक मजबूत बनाया जाएगा।
रोजगार सृजन तथा शहरों की तरफ पलायन को कम करने के लिए विभिन्न ग्रामीण गतिविधियों से संबंधित जैवपरिसरों की स्थापना पर समन्वित कार्यक्रम को प्राथमिकता दी जाएगी।
ग्रामीण लोगों में जागरूकता पैदा करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जाएगा ताकि किसानों को एन एवं एस उर्वरकों की पेटेंटेड हर्बल कोटिंग कार्यविधि से परिचित करवाया जा सके जो उन्हें रासायनिक उर्वरकों एवं खेती सामग्री के खर्चे को कम करने के साथ साथ वातावरण अनुकूल रखने के मानदंडों को पूरा करने में मदद करेगा।
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