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1986 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत बायोटेक्नोलॉजी विभाग (डी बी टी) की अलग से स्थापना करने से भारत में आधुनिक जीवविज्ञान और जैवप्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में विकास को नई शक्ति मिली है । 10 वर्षों से अधिक के अपने अस्तित्व में आने से, विभाग ने देश में जैवप्रौद्योगिकी के विकास में गति तथा प्रोत्सहान प्रदान किया है । कई अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं, प्रदर्शनियों और अवसंरचनात्मक सुविधाओं के सृजन के द्वारा इस क्षेत्र में एक साफ व्यवहार्य प्रभाव दिखाई देता है । विभाग ने प्रमुख कृषि, स्वास्थ्य देखरेख, पशु विज्ञान, पर्यावरण और उद्योग में प्रमुख क्षेत्रों में जैवप्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग और वृध्दि करने में महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की हैं ।
कृषि, स्वास्थ्य देखरेख, पर्यावरण और उद्योग में जैवप्रौद्योगिकी से संबंधित विकास का प्रभाव पहले ही दिखाई देता है और अब उत्पादों और प्रक्रियाओं पर इसके प्रयत्न किए जा रहे हैं । 5000 से अधिक प्रकाशन, 4000 पोस्ट-डाक्टोरल विद्यार्थी, उद्योगों को कई प्रौद्योगिकियां हस्तांतरित की गई हैं और यू एस पेटेन्ट सहित पेटेन्टों का दखिल किया गया है को सन्तुलित शुरूआत के रूप में विचार किया जा सकता हैं । बायोटेकेलॉजी विभाग (डी बी टी) विश्वविद्यालयों और अन्य राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की विद्यमान विशेषज्ञता का उपयोग करने के लिए प्रति वर्ष 5000 से अधिक वैज्ञानिकों के साथ अन्योन्यक्रिया कर रहा है । एक बहुत सुदृढ समीक्षा और निगरानी प्रक्रियाओं का विकास किया गया है । जैवप्रौद्योगिकी अनुप्रयोग परियोजनाओं का विकास करने के लिए, प्रमाणीकृत प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन करने के लिए, और राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों में मानव संसाधन का प्रशिक्षण देने के लिए राज्य की विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषदों के द्वारा राज्य सरकारों के साथ घनिष्ठ अन्योन्यक्रिया की जा रही है । गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उड़ीसा पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब, जम्मू व कश्मीर,मिजोरम, आंध्रप्रदेश और उत्तर प्रदेश क्षेत्रों के साथ कार्यक्रमों को बनाया गया है । मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में जैवप्रौद्योगिकी अनुप्रयोग केन्द्रों को पहले ही शुरू किया जा चुका है ।
विभाग की एक मुख्य विशेषता यह है कि विभिन्न कार्यक्रमों और गतिविधियों की पहचान करने, फारमूलेशन करने, क्रियान्वयन और निगरानी करने के लिए कई तकनीकी कार्यदलों, सलाहकार समितियों और व्यक्तिगत विशेषज्ञों के द्वारा देश के वैज्ञानिक समुदाय को गहन रूप से शामिल करना है ।
भारत में आधुनिक जीवविज्ञान और जैवप्रौद्योगिकी के पहचान किए गए क्षेत्रों में अनुसंधान ाौर विकास में दशक से अधिक संगठित प्रयत्नों ने अच्छे परिणाम दिए हैं । प्रयोगशाला स्तर पर प्रमाणित प्रौद्योगिकियों को उन्नत किया गया है । खोजों की पेटेंटिंग, उद्योगों को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और उद्योग के साथ नजदीकी अन्योन्यक्रिया ने जैवप्रौद्योगिकी अनुसंधान को नई दिशा प्रदान की है । कीट और रोग प्रतिरोध पर बल देते हुए पादपों में पराजीनी अनुसंधान, पोषकता क्षमता, रेशमकीट जीनोम विश्लेषण, मानव आनुवंशिक विकृतियों का आण्विक जीवविज्ञान, मस्तिष्क अनुसंधान, पादप जीनोम अनुसंधान, विकास, संचारी रोगों के लिए नैदानिक किटें और टीकों का मूल्यांकन और व्यापारीकरण, खाद्य जैवप्रौद्योगिकी, जैवविविधता संरक्षण और जैवपूर्वेक्षण, अनु.जाति, अनु. जनजाति, ग्रामीण क्षेत्रों, महिलाओं और विभिन्न राज्यों पर आधारित सूक्ष्म प्रवर्धन पार्कों की स्थापना करना और जैवप्रौद्योगिकी आधारित विकास को बढावा देने के लिए कार्य शुरू किए गए हैं ।
पराजीनी पादपों, पुनर्योगज टीकों और औषधों के लिए आवश्यक मार्गनिर्देशों को भी बनाया गया है । स्वदेशी क्षमताओं का एक सुदृढ अाधार बनाया गया है । अगली सहस्त्राब्दि में सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए जैवप्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई खोजों और अनुप्रयोगों दोनों के लिए प्रमुख अनुसंधान और व्यापारीकरण के प्रयत्न किए जाएंगे ।
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