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डीबीटी का सृजन
Dr S Ramachandran First DBT Secretary (1986-1992)
Dr S Ramachandran
First DBT Secretary (1986-1992)
Dr C R Bhatia Secretary (1993-1995)
Dr C R Bhatia
Secretary (1993-1995)
Dr Manju Sharma  Secretary (1995-2004).
Dr Manju Sharma
Secretary (1995-2004).
Dr M K Bhan Secretary (2005-2012)
Dr M K Bhan
Secretary (2005-2012)

बायोटेक्नोलॉजी विभाग का नेतृत्व 1986 में इसके गठन के समय से ही अनेक जाने माने वैज्ञानिकों ने किया है।

डीबीटी के विकास का क्रम
डीबीटी के विकास का क्रम

जैवविज्ञान और तकनीकी विकास के संसार में भारत ने 1986 में महत्त्वपूर्ण शुरूआत की जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने महसूस किया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत अलग से जैवविज्ञान विभाग नहीं बनाने से भारत इस क्षेत्र में पिछड़ा ही रहेगा। इसका कारण यह भी है कि विकास संबंधी कई सामान्य आर्थिक (मैक्रो इकोनॉमी) मुद्दे उस विज्ञान के विकास में समाहित हो गए थे।

इस निर्णय ने भारत को इस क्षेत्र में पहला ऐसा देश बना दिया जहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इस विधा का बिल्कुल अलग विभाग बना।

हालांकि, इस विभाग की स्थापना और शुरूआत की दिशा में काफी पहले से प्रयास शुरू हो गए थे।

वर्ष 1982 में केंद्रीय मंत्री परिषद् की तत्कालीन ‘वैज्ञानिक सलाहकार समिति’ की सिफारिशों के आधार पर वैज्ञानिक समुदाय से गहन विचार विमर्श के बाद सरकार ने ‘नेशनल बायोटेक्नोलॉजी बोर्ड (एन.बी.टी,बी)’ का गठन किया था ताकि इस दिशा में प्राथमिकताएं तय करने के साथ दीर्घावधि लाभ के दृष्टिगत योजना बनाई जा सके। गठित बोर्ड की ज़िम्मेदारी यह भी थी कि नए उभरते क्षेत्र में भारतीय क्षमताओं को सशक्त बनाए और उसके अनुसार कार्यक्रम निर्धारित करे।

भारत के योजना आयोग के तत्कालीन सदस्य (विज्ञान) प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो.एम जी के मेनन, एनबीटीबी के अध्य क्ष बनाए गए। विज्ञान से जुड़े विभिन्न सरकारी विभागों के सभी सचिव उस बोर्ड के सदस्य नियुक्त किए गए।

अंतत: वर्ष 1986 के फरवरी माह में एनबीटीबी ने अलग बायोटेक्नोंलॉजी विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी) बनाकर डॉ.एस रामचंद्रन को डीबीटी का प्रथम सचिव नियुक्त किया। डीबीटी ने दस सदस्यीय ‘वैज्ञानिक सलाहकार समिति’ (एसएसी) का गठन किया जिसमें विभिन्न वैज्ञानिक एजेंसीज़ के प्रमुखों को शामिल किया गया। इसके साथ बायोटेक्नोएलॉजी के क्षेत्र में वैश्विक विकास के साथ तालमेल बनाए रखने हेतु एक सात सदस्यीय ‘स्टैंडिंग एडवाइज़री कमेटी फॉर नार्थ अमेरिका’ (एसएसीओ) का गठन किया गया।

डॉ. एस रामचंद्रन कहते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जैवविज्ञान के क्षेत्र में वैश्विक विकास की गति को भली भांति महसूस कर लिया था कि ‘यदि इस क्षेत्र में दुनिया के साथ आगे बढ़ना है तो हमें बड़े कदम रखने होंगे।’ इसी वजह से उस छोटी सी टीम को अत्याधुनिक सीजीओ कॉम्लेा केक्सह, लोधी रोड में डीबीटी स्थापित करने हेतु स्थान प्रदान किया गया।

डॉ. रामचंद्रन के अनुसार विभाग ने एक अल्प राशि 4 से 6 करोड़ रुपयों के बजट से अपना कार्य प्रारंभ किया।

शुरूआत में कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पहले तो बहुत से विभाग अपनी ज़िम्मेदारियों को नवगठित विशेष विभाग के साथ बांटना ही नहीं चाहते थे।

दूसरी बड़ी समस्या थी, भारतीय वैज्ञानिकों की ‘भारतीय पत्रिकाओं में ही प्रकाशन की प्रवृत्ति, क्योंकि अंतराष्ट्रीय (पत्रिकाओं) में समकक्ष व्याञवसायिक जनों द्वारा बारीकी से निरीक्षण के बाद ही प्रकाशन में बहुत समय लग जाता था।

तीसरे, उद्योग जगत शुरूआत से हाथ मिलाने को बहुत इच्छुक नहीं था क्योंकि सरकारी प्रक्रिया समय ज्यादा लेती थी।

चौथी बड़ी बाधा, प्रयोगशाला में शोध हेतु ज़रूरी सामान, व्यवस्थाएं, उपकरण व रसायन आदि हासिल कर पाने की थी।

उस ज़माने में जैवविज्ञान के क्षेत्र में बहुत कम लोग अपने देश में काम कर पाते थे।अत:विभाग को निम्नलिखित बिंदुओ पर ध्यान केंद्रित करना था :-
  • मानव संसाधन विकास
  • आवश्यक व उपयुक्त ढांचागत निर्माण
  • शोध व विकास के विनियामक मानदंडों का निर्धारण
इन सभी चुनौतियों के बावजूद विभाग ने गठन के पश्चात् तुरंत काम शुरू कर दिया।
प्रथम स्वायत्त संस्थान, ‘राष्ट्री य प्रतिरक्षाविज्ञान संस्थाकन’ जिसकी स्थापना वर्ष 1981 में हुई थी, को विभाग के अंतर्गत लाया गया। इसके तुरंत बाद वर्ष 1986 में स्थापित पुणे स्थित ‘राष्ट्री य जंतु ऊतक एवं कोशिका संवर्धन सुविधा’ को इससे जोड़ा गया। जिसका नाम बाद में बदल कर ‘राष्ट्रीय कोशिका विज्ञान केंद्र’ कर दिया गया।

इसके बाद तो 1990 और 2000 की शुरूआत में कई संस्थान, उदाहरण के लिए, ‘राष्ट्री य पादप जीनोम अनुसंधान संस्थायन’ (एन आई पी जी आर), ‘राष्ट्री य मस्तिष्कर अनुसंधान संस्थाान (एन बी आर सी), ‘डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग और नैदानिकी केंद्र, ‘जैव संसाधन और स्थाहयी विकास संस्था्न’ तथा ‘जीवन विज्ञान संस्थाचन’ बने। फिर कई अन्य प्रमुख संस्थान ‘टी एच आई एस टी आई’, ‘आई एन एस टी ई एम’, ‘एन ए बी आई’ मोहाली, पश्चिम बंगाल के कल्याणी में ‘एन ए आई’ तथा ‘एन आई बी एम जी आर’ आदि स्थापित हुए।

हाल के वर्षों में ‘राष्ट्री य जैव विविधता विकास बोर्ड’ सहित कई नवीन सर्जनात्मक गतिविधियां सामने आई हैं। इसके साथ ही समाज हेतु स्वास्थ रक्षा, खाद्य पदार्थ, कृषि, उर्जा व पर्यावरण रक्षा की दिशा में नवीकृत प्रयास किए जा रहे हैं।

अंतराष्ट्रीय सहयोग में नई सुदृढ़ कार्यनीति के साथ बेहतर स्थान हासिल करते हुए उद्योग जगत के साथ मज़बूत साझेदारियां बढ़ रही हैं।

भारतीय युवाओं पर नए तरीके से ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। विभिन्न अनुदान और निधियों के साथ पुरस्कार इसके प्रमाण हैं। इसके अलावा परियोजनाओं एवं शोध के त्वरित आकलन और निधि वितरण हेतु धन सहयोग भी प्रक्रिया में सुधार लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

अब तक का संक्षिप्त इतिहास यही है।

भविष्य सुनहरा है, डीबीटी, उद्योग जगत के साथ नए कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में संलग्नं है।

हम सभी समकक्ष पणधारियों से इस ऐतिहासिक अभियान में साथ आने का आवाहन करते हैं।